🛕 हरिद्वार के प्रमुख घाट पर नई चर्चा
उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित हर की पैड़ी एक बार फिर चर्चा में है।
हाल के दिनों में यहां गैर-हिंदुओं के प्रवेश को सीमित करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। शुक्रवार को घाटों पर ऐसे नोटिस बोर्ड और पोस्टर दिखाई दिए, जिनमें हर की पैड़ी में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को वर्जित बताया गया।
हालांकि इन बोर्डों पर किसी आधिकारिक संस्था का नाम नहीं लिखा है।
📌 कुंभ मेले से पहले बढ़ी सतर्कता
स्थानीय धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि हरिद्वार एक प्रमुख तीर्थ स्थल है और आने वाले समय में यहां कुंभ मेला आयोजित होना है।
उनका तर्क है कि लाखों श्रद्धालु रोजाना गंगा स्नान और पूजा के लिए आते हैं, ऐसे में घाटों की पवित्रता और मर्यादा बनाए रखना जरूरी है।
🏛️ प्रशासन ने बनाई दूरी
जब इस विषय पर प्रशासन से सवाल किए गए, तो गढ़वाल मंडल के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि
- प्रशासन की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है
- घाटों पर लगाए गए बोर्डों की जानकारी की जांच की जा रही है
फिलहाल प्रशासन ने किसी भी तरह की रोक-टोक लागू करने से इनकार किया है।
🧾 आधार जांच और ऐतिहासिक तर्क
कुछ स्थानीय धार्मिक प्रतिनिधियों के अनुसार,
- घाट क्षेत्र में आने वाले लोगों की पहचान को लेकर स्वयंसेवी स्तर पर जांच की जा रही है
- उनका दावा है कि ब्रिटिश काल में भी हर की पैड़ी पर विशेष नियम लागू थे
हालांकि इस पर कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
🗣️ राजनीतिक और धार्मिक प्रतिक्रियाएं
▶️ सरकार की टिप्पणी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बयान देते हुए कहा कि
हरिद्वार देवभूमि का प्रवेश द्वार है और इसकी पवित्रता की रक्षा आवश्यक है, हालांकि उन्होंने किसी औपचारिक प्रतिबंध का उल्लेख नहीं किया।
▶️ विपक्ष का विरोध
समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि
धर्म के आधार पर किसी को सार्वजनिक स्थान से रोकना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
▶️ धार्मिक संतों की राय
आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि
आस्था से जुड़े स्थानों पर वही लोग आएं जो उस परंपरा और विश्वास का सम्मान करते हों, लेकिन उन्होंने भी किसी कानूनी प्रतिबंध की बात नहीं कही।
🎥 रील्स और मर्यादा का मुद्दा
कुछ स्थानीय लोगों ने धार्मिक स्थलों पर
- सोशल मीडिया रील्स
- अनुचित व्यवहार
को लेकर चिंता जताई है।
उनका कहना है कि श्रद्धा का सम्मान जरूरी है, लेकिन इसके लिए सामूहिक प्रतिबंध नहीं, बल्कि नियम और अनुशासन जरूरी है।
⚖️ निष्कर्ष
हर की पैड़ी को लेकर उठी यह बहस
- धार्मिक आस्था
- प्रशासनिक जिम्मेदारी
- संवैधानिक अधिकार
के बीच संतुलन बनाने की चुनौती पेश करती है।
फिलहाल कोई आधिकारिक आदेश लागू नहीं है और मामला चर्चा व प्रतिक्रिया के स्तर पर ही बना हुआ है।
