भारत-अमेरिका ट्रेड में नरमी के संकेत? टैरिफ पर बयान से बढ़ी हलचल

🏛️ विभाग: अंतरराष्ट्रीय व्यापार / वैश्विक कूटनीति

वैश्विक ऊर्जा राजनीति और बदलते कूटनीतिक समीकरणों के बीच भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर एक अहम संकेत सामने आया है। दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ में भविष्य में राहत मिल सकती है।


💬 टैरिफ पर क्या बोले अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी?

अमेरिकी मीडिया संस्थान पोलिटिको से बातचीत में स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ लागू होने के बाद भारत की कई रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद कम कर दी है। उनके अनुसार यह अमेरिकी नीति का अपेक्षित प्रभाव रहा है।

हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा टैरिफ व्यवस्था में बदलाव की गुंजाइश मौजूद है, यदि ऊर्जा आपूर्ति को लेकर कुछ वैकल्पिक रास्तों पर सहमति बनती है।


⚖️ अमेरिका में प्रस्तावित सख्त कदम और भारत की प्रतिक्रिया

इस मुद्दे के साथ ही अमेरिका में एक ऐसे विधेयक पर भी चर्चा हो रही है, जिसमें रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का प्रावधान हो सकता है।

इस पर भारत ने दो टूक रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की ऊर्जा नीति पूरी तरह “इंडिया फर्स्ट” सिद्धांत पर आधारित है और 140 करोड़ नागरिकों के लिए सस्ती व स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सर्वोच्च प्राथमिकता है।


🌍 यूरोप पर भी उठे सवाल

स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों की भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में रिफाइन किया गया तेल यूरोप में खरीदा जा रहा है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से वही आपूर्ति श्रृंखला बनी रहती है। उन्होंने इस स्थिति को नीति-स्तर की विसंगति बताया और यूरोपीय ऊर्जा रणनीति पर सवाल खड़े किए।


🤝 EU-India FTA और बदलता संतुलन

इसी बीच भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर बातचीत तेज हो गई है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस संभावित समझौते को दोनों पक्षों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक हालात में यूरोप भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है।


🔍 निष्कर्ष

दावोस से आए संकेत बताते हैं कि भारत-अमेरिका व्यापार संबंध पूरी तरह टकराव की दिशा में नहीं हैं। ऊर्जा, टैरिफ और कूटनीति के बीच संतुलन बनाते हुए आगे किसी समझौते की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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