🏛️ इतिहास और परंपरा (Historical Context)
- भारत में अलग रेल बजट की परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी।
- स्वतंत्रता के बाद यह परंपरा जारी रही।
- रेल बजट में नई ट्रेनें, किराया/भाड़ा बदलाव, नई लाइनें और अन्य घोषणाएं शामिल होती थीं।
📉 परंपरा समाप्त करने का कारण (Why the Railway Budget Ended)
- 2016 में नीति आयोग की समिति (बिबेक देबरॉय अध्यक्ष) ने व्हाइट पेपर पेश किया।
- निष्कर्ष: भारत दुनिया का एकमात्र देश था जहां अलग रेल बजट होता था।
- रेलवे का बजट में हिस्सा घटकर 11-15% रह गया था।
- अलग बजट से दोहराव, देरी और वित्तीय अस्पष्टता बढ़ती थी।
- 21 सितंबर 2016 को कैबिनेट ने इसे केंद्रीय बजट में विलय करने को मंजूरी दी।
- 1 फरवरी 2017 से पहला संयुक्त केंद्रीय बजट पेश किया गया।
⚖️ विलय के बाद प्रमुख बदलाव और फायदे (Key Changes & Benefits)
- पारदर्शिता में वृद्धि
- अब सरकार की सारी आय-व्यय एक ही दस्तावेज में आती है।
- संसदीय निगरानी और जनता के लिए ट्रैकिंग आसान हुई।
- डिविडेंड का बोझ खत्म
- रेलवे को सरकार को वार्षिक लाभांश देना नहीं पड़ता।
- इससे विकास, सुरक्षा और आधुनिकीकरण के लिए धन उपलब्ध हुआ।
- बेहतर समन्वय
- रेल, सड़क और जलमार्ग जैसी योजनाओं का एकीकृत दृष्टिकोण संभव हुआ।
- फंड आवंटन और परियोजनाओं की मंजूरी तेज हुई।
- प्रक्रिया सरलीकरण
- अब केवल एक Appropriation Bill बनता है।
- संसदीय चर्चा और क्रियान्वयन में समय की बचत हुई।
- रेलवे की वित्तीय मजबूती
- वंदे भारत ट्रेनें, अमृत भारत स्टेशन योजना, कवच सिस्टम जैसी पहलें संभव हुईं।
📊 आज रेलवे की वित्तीय व्यवस्था (Current Financial Structure)
- रेलवे अब भी स्वतंत्र रूप से काम करता है, लेकिन केंद्रीय बजट में विस्तृत ब्योरा पेश होता है।
- योजनाएं, खर्च और राजस्व वित्त मंत्रालय के साथ समन्वय से तय होते हैं।
- यह बदलाव संसाधनों के बेहतर उपयोग और निवेश के लिए मार्गदर्शक साबित हुआ।
🔍 निष्कर्ष (Conclusion)
92 साल पुरानी रेल बजट परंपरा का अंत केवल औपचारिक बदलाव नहीं था, बल्कि भारत की सार्वजनिक वित्त व्यवस्था में एक संरचनात्मक सुधार था।
- दोहराव और अस्पष्टता कम हुई
- संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हुआ
- रेलवे के विकास और निवेश की दिशा मजबूत हुई
