दुनिया को भारत से नेतृत्व की उम्मीद, तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं दी जा सकती: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत की भूमिका, समाज निर्माण और तकनीक के संतुलित उपयोग को लेकर व्यापक विचार रखे। उन्होंने कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज पूरी दुनिया भारत को फिर से नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रही है।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के उपलक्ष्य में “100 वर्ष की संघ यात्रा—नए क्षितिज, नए आयाम” विषय पर देहरादून स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर में आयोजित किया गया, जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर संवाद हुआ।


🇮🇳 राष्ट्र सशक्त होगा तो नागरिक भी सशक्त होंगे

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। उनका कहना था कि राष्ट्र की मजबूती से ही व्यक्ति की सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित होती है। यदि राष्ट्र कमजोर होगा तो नागरिक अपने ही देश में सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएंगे। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और अंततः सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।


🌐 भारत की नेतृत्वकारी भूमिका पर वैश्विक नजर

भागवत ने कहा कि आज विश्व भारत से दिशा और नेतृत्व की अपेक्षा कर रहा है। उन्होंने स्वयंसेवकों और नागरिकों से आह्वान किया कि वे समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएं। इस क्रम में उन्होंने “पंच परिवर्तन” के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए भारत को परम वैभव तक पहुंचाने का संकल्प लेने की बात कही।


🧠 सामाजिक बदलाव मन से शुरू होता है

उन्होंने सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव के मूल कारण पर बात करते हुए कहा कि समस्या व्यवस्था से नहीं, बल्कि मन की प्रवृत्ति से जन्म लेती है। “अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से मिटाया जाता है”—इस विचार के जरिए उन्होंने व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया। संघ में दशकों तक सेवा करने वाले स्वयंसेवक पहचान की अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि कार्य ही प्रधान होता है।


💻 तकनीक साधन है, साध्य नहीं

डिजिटल युग पर बोलते हुए मोहन भागवत ने चेताया कि तकनीक साधन है, लक्ष्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन के साथ होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और समय देना अनिवार्य है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं दी जा सकती। उन्होंने जोड़ने वाले भाव को हिंदू परंपरा का आधार बताया और मातृभूमि के प्रति भक्ति को अनिवार्य बताया। शक्ति अर्जन आवश्यक है, पर उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।


👩‍👧 महिलाओं की भागीदारी और सुशासन

संघ प्रमुख ने कहा कि महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं और देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। उन्होंने आपातकाल/प्रतिबंध काल में महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए समाज में उनकी निर्णायक भागीदारी की जरूरत बताई। साथ ही, उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से शुरू होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को बोझ और संसाधन—दोनों दृष्टि से देखने की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने समान और विचारपूर्ण नीति पर बल दिया।


🔎 निष्कर्ष

मोहन भागवत का संदेश स्पष्ट है—भारत के पास नेतृत्व की क्षमता है, बशर्ते समाज में समरसता, अनुशासन और संतुलन हो। तकनीक के दौर में मानवीय मूल्यों की रक्षा और व्यक्ति निर्माण के जरिए ही राष्ट्र सशक्त बन सकता है।

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