✍️ स्पेशल रिपोर्ट | पश्चिमी यूपी
🌊 पर्यावरण संकट: पानी बना बीमारी की जड़
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले का गंगनौली गांव बीते कुछ वर्षों में गंभीर पर्यावरणीय संकट की मिसाल बन चुका है। दूषित पेयजल के चलते गांव में अब तक 70 से अधिक लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है। ग्रामीणों का आरोप है कि आसपास की शुगर मिलों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला रासायनिक कचरा कृष्णा नदी में छोड़ा गया, जिससे भूजल जहरीला हो गया।
🏥 स्वास्थ्य विभाग की चुनौती: बढ़ती बीमारियां
गांव में
- कैंसर
- पीलिया
- एलर्जी
- लीवर और मुंह के गंभीर रोग
तेजी से फैल रहे हैं। बीमार ग्रामीणों को इलाज के लिए दिल्ली के एम्स और सफदरजंग जैसे बड़े अस्पतालों का सहारा लेना पड़ रहा है। बीते एक साल में ही करीब 20 लोगों की जान जा चुकी है।
🏗️ प्रशासनिक व्यवस्था: समाधान अधूरा
एनजीटी के निर्देशों के बाद प्रशासन ने
- हैंडपंप सील कराए
- पानी की टंकी लगवाई
लेकिन लीक होती पाइपलाइन के कारण 7,000 की आबादी तक स्वच्छ पानी नहीं पहुंच पा रहा। मजबूरी में लोग फिर से निजी सबमर्सिबल के दूषित पानी का उपयोग कर रहे हैं।
🏞️ चेक डैम बने नई मुसीबत
भूजल स्तर बढ़ाने के लिए बनाए गए कृष्णा नदी के चेक डैम अब समस्या का बड़ा कारण बन गए हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक:
- इन डैम में फैक्ट्रियों का जहरीला पानी जमा रहता है
- लंबे समय तक ठहराव से यह पानी जमीन में रिसता है
- इससे पाताल का पानी और ज्यादा दूषित हो रहा है
🗣️ स्थानीय प्रशासन बनाम जमीनी हकीकत
जहां गांव की प्रधान लगातार शिकायतों की बात कर रही हैं, वहीं
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का दावा है कि
“जांच में पानी और कैंसर के बीच सीधा संबंध नहीं मिला।”
हालांकि, गांव की गलियों में मौजूद मरीज और लगातार हो रही मौतें इन दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं।
⏳ 2010 से जारी संघर्ष
ग्रामीणों की लड़ाई साल 2010 से जारी है। एनजीटी के आदेश, प्रशासनिक कदम और वादों के बावजूद गंगनौली आज भी शुद्ध पानी और सुरक्षित जीवन का इंतजार कर रहा है।
🔎 सबसे बड़ा सवाल
क्या गंगनौली को सिर्फ एक और “कैंसर गांव” बनकर रह जाना है,
या फिर प्रदूषण पर ठोस कार्रवाई और स्थायी जल समाधान कभी मिलेगा?
