दुनिया एक बार फिर युद्ध की आग में जल रही है। मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है, तेल के कुएं निशाने पर हैं, और कतर ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं — यानी मौजूदा कीमत से लगभग दोगुनी। ऐसे में बहुत से लोग सोचते हैं कि यह युद्ध हजारों किलोमीटर दूर हो रहा है, तो हमें क्या फर्क पड़ता है? हम तो क्रिकेट देखते रहेंगे और अपनी जिंदगी जीते रहेंगे।
लेकिन यह सोच खतरनाक रूप से गलत है।
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जो आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। खाड़ी क्षेत्र भारत के बेहद करीब है और वहां जो भी होता है, उसका सीधा असर हमारी जेब, हमारी थाली और हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस लेख में हम उन चार बड़े क्षेत्रों की बात करेंगे जहां इस संघर्ष का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है — और साथ ही उन समाधानों पर भी चर्चा करेंगे जो इस संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं।
1. तेल की मार — पेट्रोल से लेकर सब्जियों तक
पहला और सबसे सीधा असर है तेल की कीमतों पर। अब कुछ लोग कहेंगे कि उनके पास गाड़ी नहीं है तो पेट्रोल महंगा होने से उन्हें क्या फर्क पड़ता है। लेकिन जरा सोचिए — खेत से बाजार तक आपकी सब्जी कैसे आती है? ट्रक और टेंपो से। अगर डीजल-पेट्रोल महंगा होगा, तो ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, और अंततः आपकी थाली में रखी सब्जियां भी महंगी हो जाएंगी। तेल की कीमत और महंगाई का सीधा रिश्ता है।
अब सबसे चिंताजनक आंकड़ा देखिए। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के डेटा के मुताबिक जापान के पास 260 दिन, सिंगापुर के पास 245 दिन, अमेरिका के पास 200 दिन और चीन के पास 104 दिन का तेल भंडार है। यानी ये देश बिना आयात किए भी कई महीने चला सकते हैं। भारत के पास कितना है? महज 25 दिन का कच्चा तेल भंडार।
हालांकि पूरी तस्वीर थोड़ी अलग है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक रिफाइनरियों और अन्य भंडारण को मिलाकर हमारे पास करीब 64.5 दिन की क्षमता है, साथ ही 9.5 दिन का सामरिक पेट्रोलियम भंडार अलग से है जिसे केवल आपात स्थिति में छुआ जाता है। वर्तमान में अनुमानित भंडार करीब 50 दिनों का है।
लेकिन असली सवाल यह है कि यह युद्ध कितने समय तक चलेगा? रूस-यूक्रेन युद्ध अब भी जारी है, इराक युद्ध 10 साल और अफगानिस्तान युद्ध 20 साल तक चला था। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचा तो हमारा भंडार पर्याप्त नहीं होगा।
और यहीं सरकार की सबसे बड़ी चूक सामने आती है। 2021 में कर्नाटक के पदुर और ओडिशा के चांदीखोल में दो अतिरिक्त सामरिक भंडारण सुविधाएं बनाने की मंजूरी दी गई थी, जो हमारी क्षमता को 6.5 मिलियन मेट्रिक टन और बढ़ा देतीं यानी मौजूदा क्षमता से दोगुनी से भी ज्यादा। लेकिन 2021 में मंजूरी के बाद इसका ठेका 2025 में दिया गया। चार साल बर्बाद हो गए। 2020 में जब कोविड लॉकडाउन के दौरान तेल की कीमतें इतिहास के सबसे निचले स्तर पर थीं, तब भी हम इसका फायदा नहीं उठा पाए क्योंकि भंडारण क्षमता नहीं थी। यह केवल लापरवाही नहीं, यह नीतिगत विफलता है जिसकी कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ेगी।
2. उद्योगों पर असर — कहीं भी बच निकलने की जगह नहीं
तेल सिर्फ गाड़ियां नहीं चलाता। यह हमारी पूरी आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ है। जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो उसका असर एक लंबी श्रृंखला पर पड़ता है।
परिवहन क्षेत्र तो सीधे प्रभावित होता ही है — बसें, ट्रक, टैक्सी, कैब सब महंगी हो जाएंगी। हवाई यात्रा पर असर और भी तेज होगा क्योंकि विमान एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF पर चलते हैं जो कच्चे तेल का एक परिष्कृत रूप है। भारत में ATF पर पहले से ही भारी कर लगते हैं, इसलिए जब आधार कीमत बढ़ेगी तो घरेलू उड़ानों के टिकट और महंगे हो जाएंगे।
इससे भी आगे जाएं तो प्लास्टिक उद्योग, जिसमें चिकित्सा उपकरणों से लेकर ऑटोमोटिव पार्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सब शामिल हैं, सीधे प्रभावित होगा। पॉलिएस्टर, नायलॉन और ऐक्रेलिक जैसे कपड़े भी कच्चे तेल के व्युत्पन्न से बनते हैं। पेंट उद्योग, चिपकने वाले पदार्थ, रेजिन — इन सभी में तेल आधारित सॉल्वेंट का उपयोग होता है। ऑटोमोटिव उद्योग में टायरों के लिए सिंथेटिक रबर और लुब्रीकेंट भी कच्चे तेल से ही आते हैं। सड़क निर्माण से लेकर घरों में पाइपलाइन तक, निर्माण क्षेत्र भी प्रभावित होगा।
भारत की एक बुनियादी कमजोरी यह है कि हम अपनी जरूरत का 80 से 90 प्रतिशत तेल आयात करते हैं। यह स्थिति जल्दी नहीं बदलेगी। इसीलिए हमें इस कमजोरी को ध्यान में रखकर आगे की योजना बनानी होगी।
3. भारत के निर्यात पर संकट — होर्मुज जलसंधि का जाम
पिछले कुछ दिनों से होर्मुज जलसंधि का नाम बार-बार सुनाई दे रहा है। यह पानी का एक छोटा सा टुकड़ा है, लेकिन यहां जहाजों का ऐसा जाम लगा है जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने धमकी दी है कि अगर कोई जहाज यहां से गुजरा तो उसे जला दिया जाएगा। पांच टैंकर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, दो लोगों की जान जा चुकी है और करीब 150 जहाजों का जाम लगा हुआ है।
कोई भी बीमा कंपनी खाड़ी में युद्ध जोखिम को कवर करने को तैयार नहीं है। और बिना बीमा के कोई व्यापारी करोड़ों रुपये के जहाज को खतरे में क्यों डालेगा? इसका नतीजा यह है कि व्यापारियों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते से जाना पड़ रहा है जिससे 14 से 20 दिन अतिरिक्त लगते हैं और लागत भी बढ़ती है। इसका अनुमानित आर्थिक नुकसान 30 अरब डॉलर तक हो सकता है।
भारत के शीर्ष 10 व्यापारिक साझेदारों में अमेरिका, यूएई, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन, जर्मनी और सऊदी अरब शामिल हैं — इन सभी के साथ व्यापार प्रभावित होगा। साथ ही होर्मुज जलसंधि में 23,000 भारतीय नाविक फंसे हुए हैं। भारत का 25 प्रतिशत व्यापार इन्हीं समुद्री मार्गों से होता है।
यहां एक और बड़ी कमजोरी सामने आती है। शिपिंग और कंटेनर के मामले में भारत आज भी विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। भारत और दक्षिण कोरिया एक समय जहाज निर्माण में बराबर थे। लेकिन हमने इस क्षेत्र में शोध और विकास को प्राथमिकता नहीं दी और आज दक्षिण कोरियाई कंपनियां भारत में जहाज निर्माण के ठेके ले रही हैं। कंटेनर बाजार में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की है। अगर हमें एक मजबूत निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था बननी है तो इन क्षेत्रों पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
4. गैस का संकट — सबसे गंभीर खतरा
तेल की तुलना में गैस का संकट कम चर्चा में है, लेकिन यह भारत के लिए सबसे खतरनाक साबित हो सकता है।
कतर दुनिया की 20 प्रतिशत प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता है और यह सारी LNG होर्मुज जलसंधि से होकर गुजरती है। कतर मुख्य रूप से भारत, चीन, जापान, पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया को LNG की आपूर्ति करता है। इन देशों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध हैं जिनमें तय मात्रा और तय कीमत होती है।
ड्रोन हमलों के बाद कतर ने फोर्स मेजर यानी अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला देते हुए अपने उत्पादन को रोक दिया है। इसका मतलब है कि पहले से तय कीमत पर वह अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकता। और अगर कल युद्ध भी खत्म हो जाए, तो गैस तुरंत उपलब्ध नहीं होगी क्योंकि बंद पड़ी रिफाइनरियों को दोबारा शुरू करने, गैस को तरल रूप देने की पूरी प्रक्रिया को फिर से शुरू करने में कई हफ्ते लग सकते हैं।
भारत में LNG का सबसे बड़ा उपयोग उर्वरक बनाने में होता है। कतर की आपूर्ति घटने से उर्वरक कंपनियां पहले ही उत्पादन कम कर चुकी हैं। इसका सीधा असर खेती पर पड़ेगा, और खेती पर असर मतलब खाद्य सुरक्षा पर खतरा। घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता पर भी संकट आ सकता है।
रूस या ऑस्ट्रेलिया से गैस खरीदी जा सकती है, लेकिन समस्या कीमत की है। जो दाम पहले तय हुए थे, उस दाम पर कोई नहीं बेचेगा। कतर के 20 प्रतिशत उत्पादन के बाजार से हटते ही बाकी 80 प्रतिशत पर दबाव बढ़ गया है, मांग वही है और आपूर्ति कम हो गई है — कीमतें तो बढ़ेंगी ही।
समाधान की राह — सिर्फ समस्या नहीं, रास्ता भी देखें
समस्याएं गिनाना आसान है, लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर हमें समाधानों पर भी सोचना चाहिए।
ईंधन की खपत कम करना इस समय सबसे जरूरी कदम है। पाकिस्तान ने ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम घोषित कर दिया। चीन ने पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात बंद कर दिया। भारत को भी सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी चाहिए। मुंबई जैसे महानगर में मात्र 2,500 बसें हैं — यह बेहद कम है। अच्छे फुटपाथ, पेड़ों की छाया और साइकिल ट्रैक बनाएं तो लोग खुद ही कम दूरी पैदल चलेंगे।
कार्यालयों के काम के घंटे विभाजित करना भी एक व्यावहारिक उपाय है। जब सब कंपनियां एक साथ काम करती हैं, ट्रैफिक जाम होता है और ईंधन बर्बाद होता है। कोविड ने दिखाया कि वर्क फ्रॉम होम संभव है। अगर युद्ध और लंबा खिंचा तो यह विकल्प फिर से अपनाना पड़ सकता है।
रणनीतिक भंडारण पर युद्धस्तरीय काम होना चाहिए। पदुर और चांदीखोल की परियोजनाएं अब सर्वोच्च प्राथमिकता पर होनी चाहिए। हर बार जब वैश्विक तेल कीमतें गिरें, हमें उसका फायदा उठाने की स्थिति में होना चाहिए।
जहाज निर्माण और कंटेनर उत्पादन में अगले 10 से 15 साल का लक्ष्य बनाकर निवेश करना होगा। यह काम कल से शुरू नहीं होगा, लेकिन शुरुआत आज ही करनी होगी।
एक जरूरी बात — अमेरिकी प्रोपेगेंडा से सावधान रहें
इस पूरे घटनाक्रम में एक बात और समझना जरूरी है। कुछ भारतीय मीडिया चैनल यह दिखा रहे हैं कि अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने की “अनुमति” दी। यह पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। भारत ने 2022 से ही रूस से तेल खरीदना शुरू किया था — अमेरिका के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक जरूरत के हिसाब से। जब रूसी तेल सस्ता था, हमने खरीदा। दरअसल तब अमेरिका भी चाहता था कि कोई रूस से खरीदे ताकि यूरोपीय देश खाड़ी देशों से खरीद सकें और वैश्विक कीमतें नियंत्रण में रहें।
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है। हम अपने फैसले खुद लेते हैं। “अनुमति” शब्द अमेरिकी प्रचार का हिस्सा है जिसे हमारा मीडिया बिना सोचे प्रसारित कर रहा है। इससे न सिर्फ भारत की छवि खराब होती है, बल्कि देश के हितों को भी नुकसान पहुंचता है।
निष्कर्ष
युद्ध चाहे जहां भी हो, उसके असर से कोई नहीं बच सकता। हम एक आपस में जुड़ी दुनिया में रहते हैं। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है — दूरदर्शिता की कमी। हम हमेशा संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देते हैं, पहले से तैयारी नहीं करते। तेल भंडारण से लेकर जहाज निर्माण तक, हम हर क्षेत्र में “too little, too late” यानी बहुत कम और बहुत देर से करते हैं।
अब वक्त आ गया है कि हम अगले 10 से 20 साल की सोच रखें। अपने हितों को सर्वोपरि रखें, अपने उद्योगों को मजबूत करें और किसी दूसरे देश के भरोसे न रहें। भारत को आगे ले जाना है तो यह काम हमें खुद करना होगा — कोई बाहर से आकर नहीं करेगा।
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