दिल्ली ब्लास्ट की साजिश: जब पढ़े-लिखे डॉक्टर बन गए एक खतरनाक नेटवर्क का हिस्सा

अगर उस दिन एसएसपी संदीप चक्रवर्ती की नजर एक साधारण से पोस्टर पर नहीं पड़ती, तो शायद भारत के कई शहरों में एक साथ भयानक हमले हो सकते थे। बाद में जांच में जो खुलासे हुए, उन्होंने पूरे देश को हैरान कर दिया।

यह मामला सिर्फ एक आतंकवादी हमले की कहानी नहीं था, बल्कि यह उस खतरनाक नेटवर्क की कहानी थी जिसमें पढ़े-लिखे लोग, मेडिकल प्रोफेशनल और अंतरराष्ट्रीय संपर्क शामिल थे।

जांच से पता चला कि यह साजिश कई सालों में तैयार हुई थी और इसमें कई शहर, कई लोग और अलग-अलग देशों तक फैले संपर्क शामिल थे।

इस कहानी की शुरुआत कश्मीर के एक छोटे से गांव से होती है।


कश्मीर के गांव से शुरू हुई कहानी

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के कॉइल गांव को कभी “डॉक्टर्स का गांव” कहा जाता था। यहां कई परिवार मेडिकल फील्ड से जुड़े थे।

24 फरवरी 1989 को इसी गांव में सरकारी शिक्षक गुलाम नबी भट्ट और उनकी पत्नी शमीना बानो के घर एक बेटे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया उमर उन नबी

परिवार की इच्छा थी कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बने।

उमर पढ़ाई में बहुत अच्छा था। स्कूल के समय से ही उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी। उस समय जम्मू-कश्मीर में मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) होता था।

पहले प्रयास में उमर को इतने अंक नहीं मिले कि उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज मिल सके। इसलिए उसने एक साल और तैयारी की।

अगले साल उसने परीक्षा दोबारा दी और इस बार उसने शानदार प्रदर्शन किया। पूरे राज्य में उसकी 28वीं रैंक आई और उसे श्रीनगर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में प्रवेश मिल गया।


कॉलेज में बना एक नया नेटवर्क

उसी समय एक और छात्र था – मुजम्मिल शकील। वह भी उसी क्षेत्र का रहने वाला था और मेडिकल की तैयारी कर रहा था।

दोनों अलग-अलग कॉलेजों में एमबीबीएस करने लगे, लेकिन उनका संपर्क बना रहा।

जांच एजेंसियों के अनुसार इसी समय कुछ ऐसे लोग इनके संपर्क में आए जिन्होंने धीरे-धीरे इनकी सोच को प्रभावित करना शुरू किया।

कॉलेज में एक पैरामेडिकल स्टाफ इरफान अहमद था। जांच में सामने आया कि उसके संबंध कट्टरपंथी संगठनों से थे।

इरफान सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए कुछ छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश करता था।

उसके साथ कॉलेज के एक शिक्षक निसार उल हसन का नाम भी सामने आया। बताया गया कि वह भी कुछ छात्रों के बीच राजनीतिक और अलगाववादी विचार फैलाता था।

धीरे-धीरे उमर, मुजम्मिल और कुछ अन्य छात्र एक ग्रुप में जुड़ गए।


पढ़ाई में भी अव्वल

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इन सबके अकादमिक रिकॉर्ड बहुत अच्छे थे।

उमर ने न केवल एमबीबीएस पूरा किया बल्कि बाद में उसने मेडिकल पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए भी परीक्षा दी।

उसकी ऑल इंडिया रैंक अच्छी आई और उसने श्रीनगर में ही एमडी शुरू कर दिया।

इतना ही नहीं, उसने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा भी दी और सरकारी मेडिकल ऑफिसर भर्ती में टॉप किया।

लेकिन उसने यह नौकरी जॉइन नहीं की।

जांच एजेंसियों के अनुसार इसी समय उसका रुझान पूरी तरह बदल चुका था।


डॉक्टर बनने के बाद बदला रास्ता

एमबीबीएस पूरा करने के बाद उमर और मुजम्मिल दोनों मेडिकल रजिस्ट्रेशन करवाकर डॉक्टर बन चुके थे।

लेकिन इसी दौरान उनका संपर्क कुछ ऐसे नेटवर्क से बढ़ता गया जो भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े थे।

जांच में सामने आया कि इन लोगों ने ऑनलाइन समूह बनाए और कुछ युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश की।

हालांकि बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लग रहा था।

उमर और उसके साथी मेडिकल करियर आगे बढ़ा रहे थे।


हरियाणा की यूनिवर्सिटी में नई शुरुआत

2021 में उमर, मुजम्मिल और मुजफ्फर नाम का एक और व्यक्ति हरियाणा के फरीदाबाद जिले के पास स्थित एक यूनिवर्सिटी में काम करने लगे।

यहां वे मेडिकल विभाग में रेजिडेंट डॉक्टर के रूप में जुड़े।

यहीं उनकी मुलाकात शाहीन सईद नाम की महिला से हुई।


शाहीन सईद कौन थी

शाहीन सईद मूल रूप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली थी और वह भी पढ़ाई में बहुत तेज थी।

उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया था और सरकारी मेडिकल कॉलेज से जुड़ी हुई थी।

लेकिन बाद में उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और विदेशों में भी काम किया।

जांच में सामने आया कि वह कई देशों की यात्रा कर चुकी थी और कुछ अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में भी थी।

फरीदाबाद आने के बाद वह भी उसी नेटवर्क का हिस्सा बन गई।


धीरे-धीरे तैयार हुई एक बड़ी साजिश

जांच के अनुसार इस ग्रुप ने कई महीनों तक गुप्त तरीके से संपर्क बनाए रखे।

वे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल करते थे और कई बार कोड शब्दों का उपयोग करते थे ताकि बातचीत आसानी से समझ में न आए।

पुलिस के अनुसार उन्होंने अलग-अलग जगहों से कुछ सामग्री इकट्ठा की और कई वाहनों की भी व्यवस्था की।

उनका मकसद भारत के कई शहरों में एक साथ हमले करने का था।

इस पूरी योजना को उन्होंने एक कोड नाम भी दिया था।


एक छोटी गलती जिसने सब बदल दिया

अक्टूबर 2025 में श्रीनगर के नौगाम इलाके में कुछ पोस्टर लगाए गए।

इन पोस्टरों में चेतावनी जैसी भाषा लिखी हुई थी।

अक्सर ऐसे पोस्टर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं, लेकिन उस दिन एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संदीप चक्रवर्ती की नजर उस पर पड़ गई।

उन्हें यह मामला संदिग्ध लगा और उन्होंने तुरंत जांच शुरू करने का आदेश दिया।


सीसीटीवी से खुला राज

जांच के दौरान आसपास के सीसीटीवी फुटेज चेक किए गए।

इन फुटेज में कुछ स्थानीय युवक पोस्टर लगाते दिखाई दिए।

पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की।

पूछताछ के दौरान एक नाम सामने आया — इरफान अहमद

जब पुलिस ने इरफान को पकड़ा और उसके डिजिटल डिवाइस की जांच की, तो एक बड़ा नेटवर्क सामने आने लगा।


फरीदाबाद कनेक्शन

इरफान के फोन और लैपटॉप से मिली जानकारी के आधार पर जांच एजेंसियां हरियाणा के फरीदाबाद पहुंचीं।

यहां एक यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े कुछ लोगों के नाम सामने आए।

जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि कुछ संदिग्ध गतिविधियां कई महीनों से चल रही थीं।

इसके बाद पुलिस और अन्य एजेंसियों ने संयुक्त कार्रवाई करने का फैसला किया।


यूनिवर्सिटी में छापा

30 अक्टूबर 2025 को पुलिस टीम ने हरियाणा में एक बड़े सर्च ऑपरेशन की शुरुआत की।

इस दौरान कई जगहों पर छापे मारे गए।

कुछ संदिग्धों को हिरासत में लिया गया और कई डिजिटल डिवाइस जब्त किए गए।

जांच में कई चौंकाने वाले सबूत मिले जिनसे यह संकेत मिला कि एक बड़ी साजिश तैयार की जा रही थी।


कई जगहों से बरामद हुआ सामान

सर्च ऑपरेशन के दौरान पुलिस ने अलग-अलग स्थानों से बड़ी मात्रा में संदिग्ध सामग्री बरामद की।

इसके अलावा कुछ वाहन और अन्य सामान भी जब्त किए गए जिनकी जांच की गई।

इन सबके आधार पर एजेंसियों को यह समझ में आ गया कि योजना काफी बड़े स्तर की थी।


कुछ आरोपी फरार

छापेमारी के दौरान कुछ लोग पकड़े गए, लेकिन कुछ आरोपी वहां से निकलने में सफल हो गए।

पुलिस ने उनकी तलाश शुरू कर दी।

इस बीच कई राज्यों में जांच एजेंसियों की टीमें सक्रिय हो गईं।


दिल्ली में हुआ धमाका

9 नवंबर 2025 की शाम दिल्ली के भीड़भाड़ वाले इलाके में एक विस्फोट हुआ।

इस घटना में 15 लोगों की जान चली गई और कई लोग घायल हो गए

घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई।

तुरंत पुलिस, एनआईए और अन्य एजेंसियां सक्रिय हो गईं।


जांच एनआईए को सौंपी गई

अगले ही दिन इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दी गई।

एनआईए ने कई राज्यों में छापेमारी की और पहले से चल रही जांच को जोड़कर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़नी शुरू कीं।

जांच में यह भी पता चला कि कुछ आरोपी देश छोड़कर भागने की कोशिश कर रहे थे।


कई गिरफ्तारियां

कुछ दिनों के अंदर अलग-अलग शहरों से कई संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया गया।

उनमें शाहीन सईद भी शामिल थी जिसे भागने की कोशिश के दौरान पकड़ा गया।

इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी जांच में शामिल हो गया।


यूनिवर्सिटी की जांच

इस मामले के सामने आने के बाद संबंधित यूनिवर्सिटी की भी जांच शुरू हुई।

सरकारी एजेंसियों ने उसके वित्तीय रिकॉर्ड, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और नियुक्तियों की जांच की।

कुछ समय बाद उसकी मान्यता भी निलंबित कर दी गई।


गांव तक पहुंची जांच

जांच एजेंसियां उमर के गांव भी पहुंचीं जहां उसका जन्म हुआ था।

परिवार के लोगों से पूछताछ की गई और कई तकनीकी जांच भी की गईं।

डिजिटल सबूतों और अन्य जांच के आधार पर घटना की कड़ियां जोड़ने का प्रयास किया गया।


एक चौंकाने वाली सच्चाई

इस पूरे मामले ने देश को एक बड़ा सवाल सोचने पर मजबूर कर दिया।

ये लोग पढ़े-लिखे थे।
डॉक्टर थे।
कई परीक्षाओं में टॉप कर चुके थे।

लेकिन इसके बावजूद वे एक खतरनाक नेटवर्क का हिस्सा बन गए।


निष्कर्ष

दिल्ली धमाके की यह कहानी सिर्फ एक आतंकी घटना की कहानी नहीं है।

यह उस जटिल नेटवर्क की कहानी है जिसमें विचारधारा, डिजिटल संपर्क, अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन और स्थानीय सहयोग शामिल थे।

अगर एक पोस्टर पर ध्यान न दिया जाता, तो शायद स्थिति और भी गंभीर हो सकती थी।

यह घटना यह भी याद दिलाती है कि सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और समय पर की गई कार्रवाई कितनी महत्वपूर्ण होती है।

ईरान-अमेरिका युद्ध का भारत पर असर: 4 बड़े खतरे और उनके समाधान

Back To Top