मध्य-पूर्व में भड़की जंग का असर अब केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। इसके झटके पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच रहे हैं। भारत में भी इसका असर साफ दिखाई देने लगा है। पिछले कुछ दिनों से देश के कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। होटल, रेस्टोरेंट, छोटे ढाबे, कैटरिंग सर्विस और यहां तक कि कुछ गैस आधारित श्मशान घाट भी प्रभावित हो रहे हैं। कई जगहों पर सिलेंडर ब्लैक मार्केट में ऊंचे दामों पर बिक रहे हैं, जबकि आम लोग गैस एजेंसियों के बाहर लंबी लाइनें लगाकर इंतजार कर रहे हैं।
यह संकट अचानक नहीं आया है। इसके पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक कारण है — ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता सैन्य तनाव और दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), का बंद होना। यही वह रास्ता है जिससे दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल और गैस गुजरता है। जब यह रास्ता बाधित होता है तो पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो जाती है।
भारत में एलपीजी की बढ़ती समस्या
पिछले एक सप्ताह के भीतर भारत के अलग-अलग हिस्सों से एलपीजी की कमी की खबरें सामने आने लगीं। कई शहरों में गैस सिलेंडर की बुकिंग बढ़ गई और लोगों ने घबराहट में पहले से ही सिलेंडर बुक कराना शुरू कर दिया। कुछ जगहों पर गैस एजेंसियों ने बताया कि डिलीवरी में देरी हो रही है और स्टॉक सीमित है।
मुंबई में होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री सबसे ज्यादा प्रभावित दिखाई दे रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 20 प्रतिशत होटल और रेस्टोरेंट अस्थायी रूप से बंद हो चुके हैं और अगले कुछ दिनों में यह संख्या और बढ़ सकती है। कई रेस्टोरेंट्स ने अपने मेन्यू को सीमित कर दिया है क्योंकि उनके पास गैस की पर्याप्त सप्लाई नहीं है।
दिल्ली और एनसीआर में भी हालात चिंताजनक बताए जा रहे हैं। कुछ जगहों पर 900 रुपये के सिलेंडर को 1500 से 2000 रुपये तक में ब्लैक मार्केट में बेचा जा रहा है। कई छोटे फूड स्टॉल और ढाबों ने अस्थायी रूप से अपना काम बंद कर दिया है क्योंकि उनके पास खाना बनाने के लिए गैस उपलब्ध नहीं है।
बेंगलुरु में होटल इंडस्ट्री पर इसका बड़ा असर पड़ा है। कुछ रेस्टोरेंट्स ने अपना पूरा मेन्यू बंद कर दिया है और केवल चाय-कॉफी या हल्के स्नैक्स ही परोस रहे हैं। वहीं चेन्नई में हजारों रेस्टोरेंट्स ने सरकार से तुरंत गैस सप्लाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
कोलकाता में कई होटल और ढाबों ने अपने मेन्यू को छोटा कर दिया है और केवल सीमित खाद्य पदार्थ ही परोसे जा रहे हैं। कुछ जगहों पर रसोई में लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल करके खाना बनाने की तैयारी की जा रही है।
उद्योग और सेवाओं पर असर
एलपीजी केवल घरेलू रसोई तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग कई उद्योगों और सेवाओं में भी होता है। रेस्टोरेंट, कैटरिंग, फूड प्रोसेसिंग यूनिट, बेकरी, होटल, ढाबे और शादी समारोहों में बड़े पैमाने पर एलपीजी का इस्तेमाल किया जाता है।
भारत में लगभग 90 प्रतिशत रेस्टोरेंट्स एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर हैं। नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार देश में करीब 5 लाख से अधिक रेस्टोरेंट्स हैं, जिनमें लगभग 80 लाख लोग काम करते हैं। यदि गैस की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो इन लाखों कर्मचारियों की नौकरियों पर खतरा पैदा हो सकता है।
फूड डिलीवरी सेक्टर भी इससे प्रभावित हो सकता है। अगर रेस्टोरेंट्स बंद होते हैं या उनकी उत्पादन क्षमता कम होती है तो ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा।
कुछ शहरों में गैस की कमी का असर श्मशान घाटों तक पहुंच गया है। गैस आधारित क्रेमेटोरियम्स को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है क्योंकि उनके पास पर्याप्त गैस उपलब्ध नहीं है।
सरकार के कदम और बयान
जब देश के कई हिस्सों से गैस की कमी की खबरें सामने आने लगीं तो सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए कुछ कदम उठाए। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 (Essential Commodities Act) को लागू किया गया ताकि ईंधन की आपूर्ति को नियंत्रित किया जा सके और जमाखोरी व कालाबाजारी पर रोक लगाई जा सके।
इसके साथ ही प्राकृतिक गैस आपूर्ति के लिए नई प्राथमिकता व्यवस्था भी लागू की गई। इस व्यवस्था के तहत गैस की आपूर्ति को चार श्रेणियों में बांटा गया।
पहली प्राथमिकता घरेलू पाइप्ड गैस, सीएनजी और परिवहन क्षेत्र को दी गई है। दूसरी प्राथमिकता उर्वरक उद्योग को दी गई है क्योंकि कृषि उत्पादन के लिए उर्वरकों की आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण होती है। तीसरी श्रेणी में चाय उद्योग और कुछ अन्य विनिर्माण क्षेत्र आते हैं। चौथी श्रेणी में बाकी सभी उद्योगों और सेवाओं को रखा गया है।
सरकार की ओर से कई बयान भी सामने आए। ऊर्जा मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा कि देश में ऊर्जा की कोई कमी नहीं है और स्थिति नियंत्रण में है। सरकार ने यह भी कहा कि भारत अन्य देशों से गैस और तेल की आपूर्ति के विकल्प तलाश रहा है।
संकट की जड़: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह समुद्री रास्ता केवल लगभग 21 मील चौड़ा है, लेकिन दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है।
सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादक देश अपने तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से निर्यात करते हैं। हर दिन लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल तेल इसी मार्ग से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचता है।
यदि यह रास्ता किसी कारण से बंद हो जाता है या यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में तुरंत अस्थिरता आ जाती है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के दौरान इस रास्ते में जहाजों की आवाजाही कम हो गई है। कुछ शिपिंग कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं अस्थायी रूप से रोक दी हैं। इससे तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो रही है।
एशिया पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है क्योंकि एशिया दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक क्षेत्र है। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देश मध्य-पूर्व से आने वाले तेल और गैस पर काफी हद तक निर्भर हैं।
कुछ एशियाई देशों ने पहले ही ऊर्जा बचत के उपाय शुरू कर दिए हैं। कहीं सरकारी कार्यालयों में ऊर्जा उपयोग कम करने के निर्देश दिए गए हैं तो कहीं लोगों को बिजली और ईंधन की खपत कम करने के लिए कहा जा रहा है।
भारत भी ऊर्जा के मामले में आयात पर काफी निर्भर है। एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। यदि वैश्विक सप्लाई प्रभावित होती है तो इसका असर भारत के बाजार पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है।
रूस और वैश्विक ऊर्जा राजनीति
इस पूरे संकट में वैश्विक ऊर्जा राजनीति भी एक अहम भूमिका निभा रही है। रूस, अमेरिका और मध्य-पूर्व के देशों के बीच तेल और गैस का व्यापार अंतरराष्ट्रीय राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने यूरोप के बजाय एशिया की ओर अपने ऊर्जा निर्यात का रुख बढ़ाया है। भारत भी पिछले कुछ वर्षों में रूस से काफी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है।
लेकिन जब वैश्विक संकट बढ़ता है तो ऊर्जा की कीमतें तेजी से बदलती हैं। ऐसे समय में कई देशों को महंगे दामों पर तेल और गैस खरीदना पड़ सकता है।
भारत के लिए बड़ा सबक
यह संकट केवल एलपीजी की अस्थायी कमी का मामला नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा सवाल भी उठाता है। जब किसी देश की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर होती हैं तो वैश्विक घटनाओं का असर सीधे उस देश की अर्थव्यवस्था और जनता पर पड़ता है।
भारत को भविष्य में ऊर्जा के अधिक विविध स्रोत विकसित करने की जरूरत है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू गैस उत्पादन और वैकल्पिक ईंधन के विकास पर जोर देना होगा। इसके अलावा ऊर्जा भंडारण और रणनीतिक रिजर्व को भी मजबूत करना जरूरी है ताकि वैश्विक संकट के समय देश की आपूर्ति प्रभावित न हो।
आगे क्या हो सकता है
अगर मध्य-पूर्व में तनाव जल्दी कम नहीं हुआ और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य नहीं हुई तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका असर लंबे समय तक रह सकता है।
इसका मतलब है कि तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति आर्थिक चुनौती बन सकती है क्योंकि ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से महंगाई भी बढ़ती है।
हालांकि सरकार और ऊर्जा कंपनियां वैकल्पिक सप्लाई चैनल खोजने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन ऐसे बड़े वैश्विक संकट का असर पूरी तरह से टालना आसान नहीं होता।
निष्कर्ष
मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में पैदा हुआ संकट हमें यह याद दिलाता है कि आज की वैश्विक दुनिया में कोई भी देश पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। दुनिया के एक हिस्से में होने वाली घटना का असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है।
भारत में एलपीजी की कमी की खबरें इसी वैश्विक जुड़ाव का उदाहरण हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह संकट कितनी जल्दी खत्म होता है और दुनिया के देश ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि घबराहट में खरीदारी और जमाखोरी से बचा जाए और ऊर्जा संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए। क्योंकि जब वैश्विक संकट पैदा होता है तो सबसे ज्यादा असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर ही पड़ता है।
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