27 जून 1976 की सुबह इज़राइल के तेल अवीव स्थित
Ben Gurion International Airport
पर सब कुछ सामान्य था। उस दिन सुबह लगभग 9 बजे
Air France
की फ्लाइट AF139 को पेरिस के लिए उड़ान भरनी थी।
यह फ्लाइट सीधे पेरिस नहीं जाती थी। रास्ते में इसका एक स्टॉप
Athens,
Greece
में था, जहां से कुछ और यात्रियों को इस विमान में सवार होना था।
विमान में लगभग 246 यात्री और 12 क्रू मेंबर थे। इनमें कई देशों के लोग थे, लेकिन क्योंकि फ्लाइट इज़राइल से उड़ान भर रही थी, इसलिए यात्रियों में बड़ी संख्या यहूदी और इज़राइली नागरिकों की थी।
9 बजे के आसपास विमान उड़ान भरता है और सब कुछ सामान्य लगता है। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही घंटों में यह फ्लाइट एक अंतरराष्ट्रीय संकट का केंद्र बनने वाली है।
एथेंस से शुरू हुआ हाईजैकिंग का खेल
करीब 11:30 बजे विमान एथेंस में उतरता है। यहां लगभग 38 यात्री उतरते हैं और करीब 58 नए यात्री विमान में चढ़ते हैं।
इन्हीं 58 यात्रियों के बीच चार आतंकवादी भी सवार हो जाते हैं। उस समय एयरपोर्ट सुरक्षा उतनी सख्त नहीं थी जितनी आज है। एक मेटल डिटेक्टर काम नहीं कर रहा था और एक्स-रे स्कैनिंग भी ढंग से नहीं हो रही थी।
इस वजह से ये चारों लोग पिस्तौल और हैंड ग्रेनेड अपने बैग में छिपाकर आसानी से विमान में प्रवेश कर गए।
इन चार आतंकवादियों में:
- दो सदस्य फ़िलिस्तीनी संगठन
Popular Front for the Liberation of Palestine
से थे - और दो सदस्य जर्मनी के उग्रवादी संगठन
Revolutionary Cells
से थे।
ये लोग अलग-अलग सीटों पर बैठ गए ताकि किसी को शक न हो।
उड़ान के कुछ मिनट बाद ही हाईजैक
विमान एथेंस से उड़ान भरता है और लगभग 8 मिनट बाद, जब यह
Gulf of Corinth
के ऊपर पहुंचता है, तभी अचानक स्थिति बदल जाती है।
फर्स्ट क्लास में बैठे दो आतंकवादी अचानक उठते हैं। उनके हाथ में पिस्तौल और ग्रेनेड होते हैं। वे तेजी से कॉकपिट की ओर बढ़ते हैं।
कॉकपिट में उस समय कप्तान
Michel Bacos
और उनकी टीम मौजूद थी।
कुछ ही मिनटों में आतंकवादी कॉकपिट पर कब्जा कर लेते हैं और पायलट को आदेश देते हैं कि विमान को पेरिस की बजाय दक्षिण दिशा में मोड़ दिया जाए।
अब विमान पूरी तरह उनके नियंत्रण में था।
माइक्रोफोन लेकर आतंकवादी घोषणा करते हैं:
“यह विमान हाईजैक हो चुका है। अगर कोई विरोध करेगा तो हम विमान को उड़ा देंगे।”
पहला पड़ाव: लीबिया
आतंकवादी विमान को
Benghazi,
Libya
ले जाते हैं।
विमान वहां लगभग 6–7 घंटे रुकता है। ईंधन भरा जाता है और कुछ औपचारिकताएँ पूरी होती हैं। इसके बाद विमान फिर उड़ान भरता है।
अब उसका अगला गंतव्य था
Entebbe,
Uganda।
युगांडा क्यों?
उस समय युगांडा का राष्ट्रपति था
Idi Amin।
उसकी छवि दुनिया भर में बेहद विवादित थी। उस पर मानवाधिकार उल्लंघन, हिंसा और तानाशाही के कई आरोप थे। साथ ही वह इज़राइल का कट्टर विरोधी भी माना जाता था।
इसलिए जब यात्रियों को पता चला कि विमान युगांडा जा रहा है, तो उनमें डर और बढ़ गया।
एंटेब्बे एयरपोर्ट पर बंधक
29 जून 1976 को विमान
Entebbe International Airport
पर उतरता है।
यहां सभी यात्रियों को विमान से उतारकर पुराने टर्मिनल भवन में ले जाया जाता है।
यहां एक और चौंकाने वाली घटना होती है—तीन और आतंकवादी इस समूह में शामिल हो जाते हैं।
अब कुल 7 आतंकवादी बंधकों को नियंत्रित कर रहे थे।
कुछ समय बाद आतंकवादी यात्रियों के पासपोर्ट लेते हैं और उन्हें दो समूहों में बाँट देते हैं:
- यहूदी और इज़राइली यात्री
- अन्य देशों के यात्री
गैर-इज़राइली यात्रियों को बाद में रिहा कर दिया जाता है, लेकिन लगभग 100 से अधिक इज़राइली और यहूदी यात्री बंधक बने रहते हैं।
आतंकवादियों की मांग
आतंकवादियों ने अपनी मांग रखी:
- विभिन्न देशों की जेलों में बंद 53 कैदियों को रिहा किया जाए
- इज़राइल विशेष रूप से अपने यहां बंद 40 कैदियों को छोड़े
- और 5 मिलियन डॉलर दिए जाएँ
इसके लिए 1 जुलाई 1976 की समय सीमा तय की गई।
अगर मांगें पूरी नहीं होतीं, तो बंधकों को मारने की धमकी दी गई।
इज़राइल में संकट
इज़राइल में तत्काल आपात बैठकें शुरू हो गईं।
उस समय देश के प्रधानमंत्री थे
Yitzhak Rabin
और रक्षा मंत्री थे
Shimon Peres।
सरकार के सामने दो विकल्प थे:
- आतंकवादियों की मांग मानना
- या सैन्य कार्रवाई करना
क्योंकि बंधक एक दुश्मन देश में थे, इसलिए सैन्य अभियान बहुत जोखिम भरा था।
लेकिन रक्षा मंत्री शिमोन पेरेस का मानना था कि आतंकवादियों के सामने झुकना भविष्य में और खतरे पैदा करेगा।
खुफिया जानकारी जुटाना
इज़राइल की खुफिया एजेंसी
Mossad
और सेना ने तेजी से जानकारी जुटाना शुरू किया।
रिहा किए गए यात्रियों से पूछताछ की गई।
सबसे महत्वपूर्ण जानकारी तब मिली जब पता चला कि पुराने टर्मिनल की इमारत एक इज़राइली कंपनी ने बनाई थी।
इससे इज़राइल को इमारत का पूरा नक्शा मिल गया।
अब एक साहसी योजना तैयार की गई।
ऑपरेशन थंडरबोल्ट
इस सैन्य अभियान का नाम रखा गया
Operation Thunderbolt
(बाद में इसे
Operation Entebbe
भी कहा गया)।
योजना बेहद साहसी थी:
- इज़राइल से 4000 किमी दूर उड़ान
- दुश्मन देश के एयरपोर्ट पर अचानक हमला
- बंधकों को छुड़ाना
- और सुरक्षित वापस लौटना
मिशन की तैयारी
3 जुलाई 1976 की रात को चार
Lockheed C-130 Hercules
विमान उड़ान भरते हैं।
इनमें लगभग 100 से ज्यादा कमांडो सवार थे।
मिशन का नेतृत्व कर रहे थे
Yonatan Netanyahu।
वे भविष्य के इज़राइली प्रधानमंत्री
Benjamin Netanyahu
के बड़े भाई थे।
4000 किमी की गुप्त उड़ान
विमान लाल सागर के ऊपर बेहद कम ऊंचाई पर उड़ते हैं ताकि रडार से बचा जा सके।
लंबी उड़ान के बाद वे एंटेब्बे एयरपोर्ट के पास पहुंचते हैं।
रात के अंधेरे में पहला विमान उतरता है और उसके साथ ही एक दिलचस्प रणनीति लागू की जाती है।
नकली राष्ट्रपति काफिला
कमांडो अपने साथ एक काली
Mercedes-Benz 600
और कुछ
Land Rover Series III
गाड़ियाँ लाए थे।
योजना यह थी कि वे राष्ट्रपति इदी अमीन के काफिले जैसा दृश्य बनाकर टर्मिनल तक पहुंच जाएंगे।
लेकिन रास्ते में दो युगांडा सैनिकों को शक हो जाता है।
स्थिति को देखते हुए कमांडो कार्रवाई करते हैं और तेजी से टर्मिनल की ओर बढ़ते हैं।
टर्मिनल पर हमला
कमांडो कुछ ही मिनटों में टर्मिनल के अंदर पहुँच जाते हैं।
वे लाउडस्पीकर से घोषणा करते हैं कि सभी यात्री जमीन पर लेट जाएँ।
कुछ ही मिनटों में आतंकवादियों को निष्क्रिय कर दिया जाता है।
कुल 7 आतंकवादी मारे जाते हैं और बंधकों को सुरक्षित निकाल लिया जाता है।
53 मिनट का ऑपरेशन
पूरा ऑपरेशन सिर्फ 53 मिनट में पूरा हो जाता है।
लेकिन इस दौरान:
- 3 बंधकों की मौत हो जाती है
- और कमांडो लीडर
Yonatan Netanyahu
गंभीर रूप से घायल होकर शहीद हो जाते हैं।
युगांडा के फाइटर जेट नष्ट
वापसी से पहले इज़राइली कमांडो युगांडा एयरफोर्स के
MiG fighter jets
को भी नष्ट कर देते हैं ताकि पीछा न किया जा सके।
इसके बाद सभी विमान उड़ान भरते हैं और
Kenya
में ईंधन भरने के बाद इज़राइल लौट जाते हैं।
ऑपरेशन का परिणाम
106 बंधकों में से:
- 102 सुरक्षित बचाए गए
- 3 मारे गए
- 1 बंधक अस्पताल में रह गया था
बाद में खबर आई कि उस महिला
Dora Bloch
को युगांडा में मार दिया गया।
ऑपरेशन का नाम बदला गया
इस मिशन के बाद ऑपरेशन का नाम बदलकर
ऑपरेशन योनातन रखा गया,
कमांडो लीडर योनी नेतन्याहू की याद में।
ऐतिहासिक महत्व
आज भी यह ऑपरेशन दुनिया के सबसे साहसी सैन्य अभियानों में गिना जाता है।
4000 किमी दूर जाकर:
- दुश्मन देश में उतरना
- आतंकवादियों को हराना
- और बंधकों को सुरक्षित वापस लाना
यह सब बेहद कम समय में किया गया।
राजनीतिक असर
इस घटना का असर इज़राइल की राजनीति पर भी पड़ा।
योनी नेतन्याहू की शहादत और मिशन की सफलता ने उनके भाई
Benjamin Netanyahu
को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
आगे चलकर वे कई बार इज़राइल के प्रधानमंत्री बने।
निष्कर्ष
1976 का एंटेब्बे रेस्क्यू ऑपरेशन केवल एक सैन्य मिशन नहीं था, बल्कि यह साहस, योजना और तेजी का असाधारण उदाहरण था।
इस घटना ने दुनिया को दिखाया कि संकट की घड़ी में रणनीति, खुफिया जानकारी और साहसिक निर्णय किस तरह इतिहास बदल सकते हैं।
आज भी
ऑपरेशन थंडरबोल्ट
को दुनिया के सबसे सफल और साहसी बंधक-मुक्ति अभियानों में गिना जाता है।
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